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Monday, April 11

उस दिल मे जो है छिपा

उस दिल मे जो है छिपा, जान ना पाया हूं ।

जो स्वपन देखती हैं मेरे संग वो आंखें,
मुझसे पहले भी ख्वाब बुना करती होंगी ?
जो रातें अब मेरी यादों मे कटती हैं,
मुझसे पहले क्या सोच कटा करती होंगी ?

अंजान स्वपन रत्नों से भरे हुए उसके
मन आगारों मे अभी झांक ना पाया हूं ।

उस दिल मे जो है छिपा, जान ना पाया हूं ।

अब तान छेडता हूं मैं उसके हाथों पर,
कल तक क्या जीवन राग हुआ करता होगा ?
अब गीत है अपने प्यार, मिलन, विरह का तो ,
मुझसे पहले क्या गीत हुआ करता होगा ?

जो सांझ सवेरे मन गुंजन गाता होगा,
वो स्वरलहरी मैं अभी कहां सुन पाया हूं ?

उस दिल मे जो है छिपा, जान ना पाया हूं ।

इस बार नही फ़ूला है बस वन उपवन मे,
इस बार बसंती रंग चढा मन पर मेरे ।
और उन जाने अंजाने रंगों से प्रियतम,
मैंने अपने जीवन के कितने चित्र उकेरे ।

पर तेरे मन की शाखों पर जो फ़ूल खिले,
उनके रंग अब तक देख कहां मैं पाया हूं ?

उस दिल मे जो है छिपा, जान ना पाया हूं ।

5 comments:

Anonymous said...

achhit kavita hai keep writing :-)

Braveheart said...

One thing -- Strangely so, I can see that you write very much on purpose, which means something I can't explain much. What it does to the rhythm of the poetry it to stiffen it.

If you can see it and want to overcome it, there's just one way. Dont write on purpose. Take yourself into that state where the images come to you in flashes. There will be plenty of them for you to catch up some and give them your own words.

I hope you understand. Otherwise, good effort.

-- Akshaya

Vibhanshu Abhishek 3.1 said...

the only time u actually make sense is while u write poetry. Tho its difficult getting the context in which u write :-?

Anyways how abt dinner sometime ?

abhaya said...

BH: I know what you mean, I think I do but somehow I am unwilling to enter those waters right now.

Vibs: Atleast I am making some sense to you. That should suffice for the moment ;) and yes, a dinner is positively on cards. Will catch ya soon.

Jitendra Chaudhary said...

भई कविता तो बहुत अच्छी है,
अब तो भई, हिन्दी मे लिखने के लिये एक अलग से ब्लाग बना ही दो.

बहुत अच्छे, लिखते रहिये.