Google Analytics

Wednesday, August 23

परदेस

वो जगते हैं, हम सोते हैं, वो सोते हैं , हम जगते हैं,
अब सारे रात और दिन अपने, बस आंखों मे ही कटते हैं ।

क्यों हर लब है ख़ामोश यहां, हर आंख मे क्यों वीरानी सी,
है आग कहां जज्बातों की, क्यों दिल ना यहां तड़पते हैं ?

बचने को सवालों से जग के, आंखें सूखी ही रखते हैं,
दो बूंद बहा लेते हैं बस, जब झूम के बादल फटते हैं ।

अपना आवारा दिल भी अबकी बार बड़ा संजीदा है,
आये हो इतनी दूर कहो, घर वापस तो जा सकते हैं ?

क्यों राह लगे पहचानी सी, क्यों हर आहट पर कान लगे?
अब कहां अभागा यार यहां, हम किसकी राहें तकते हैं ?

3 comments:

Diwaker said...

very battr, abhaga. maja aa gayi padh kar!

Gautam Goswami said...

That was great poetry Abhaya. If it was original then u surely are gifted. It brought the memories of my city (lucknow) and friends and family.

Braveheart said...

I am sure you are getting more adulation than you deserve. Don't take it to your heart :D

Needs a lot of improvement. Specifically, you need to do something about your metaphors. They are weak, cliched and very inexpressive. Use some more imagination, perhaps!

-- Akshaya