हल्ला बोल

पिछले शुक्रवार को तकरीबन १ माह से चल रहे NIST Machine Translation Evaluation का अंत हो गया और बहुत दिनों बाद चैन की सांस मिली। वैसे जो काम चल रहा था वह भी कुछ कम मज़ेदार नही था, काम था एक उर्दू से English मे अनुवाद करने का सिस्टम बनाना। इसी बहाने मैने उर्दू लिपी को थोडा बहुत पडना सीख लिया। इस पर आगे काम होगा कि नही यह तो नही पता पर अभी के नतीजों का बेसब्री से इंतज़ार है।

इतने दिन बाद मिले अवकाश का फ़ायदा उठाते हुये मैने जमा हो गये ई-मेल और ब्लाग पड डाले। उसी मे से एक ब्लाग से पी. साईनाथ का मैगासेसे अवार्ड मिलने के अवसर पर दिया गया व्क्तव्य पडने को मिला जिसने पूरे दिल-ओ-दिमाग को हिला दिया। किसानों की आत्महत्याओं के बारे मे पहले भी पडा था और तब भी बुरा लगा था पर उस वक्तव्य को पडने के बाद एक ऐसी बेचैनी का अनुभव होता है कि फ़ौरन ही इसके बारे मे कुछ किया जाये। मुझे पता नही मैं कब और क्या कर पाऊंगा पर अब मन मे ये बात अटक तो गयी है एक लम्बे समय के लिये । आप लोगों के लिये भी ये रही वो लिंक -

http://subalternstudies.com/?p=153

और करेले को नीम चडाते हुये आज मैने हल्ला बोल फ़िल्म देख ली। फ़िल्म कई स्तरों पर कमज़ोर है पर मेरी मनोस्थिती क असर कह लीजिये कि कल की कुछ करने की भावना अब और भडक उठी है। पता है कि अगले कुछ दिनों मे काम के बोझ के नीचे ये सब भी थोडा दब जायेगा पर गर्मियों मे देश पहुंचने के बाद ये फ़िर से ऊपर आयेगा इसकी पूरी गारन्टी है ।
साल की शुरुआत अच्छी हुई है। आगे देखते हैं कि क्या होता है ।

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