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Saturday, May 13

अम्बर का छोटा सा टुकडा

(There is a window right behind where I sit in my office through which I can see a small patch of sky.)

मेरे पीछे की खिडकी मे रहने वाला,
अम्बर का छोटा सा टुकडा,
मुझसे बात किया करता है ।

सूरज की किरणों से तप कर,
श्याम वर्ण जब हो जाता तो,
अपने कुम्हलाये चेहरे पर,
फ़ूट फ़ूट रोया करता है ।

अम्बर का छोटा सा टुकडा,
मुझसे बात किया करता है ।

कभी कभी अपने संग अपनी,
चिर प्रेयसी वायु को ला कर,
फ़िर वितान मे छिप लज्जा से,
टुकुर टुकुर देखा करता है।

अम्बर का छोटा सा टुकडा,
मुझसे बात किया करता है ।

कभी जो धुन्धलाती शामों मे,
मन एकाकी सा हो जाता,
खोल पिटारे,ला कर तारे,
साथ मेरे खेला करता है।

अम्बर का छोटा सा टुकडा,
मुझसे बात किया करता है ।

पूछा नही कभी पर अक्सर,
ये सोचा करता मन ही मन,
कभी सुना होगा इसने भी,
मेघदूत का प्रणय निवेदन?
समझ सकेगा क्या ये अल्हड,
मूक वेदना मेरे मन की?
और कभी क्या झांकेगा ये,
दूर देश,उस घर की खिडकी ?
और कहेगा आतुर जन से,

दूर देश मे बसा अभागा,
तुमको याद किया करता है।
पास नही तुम हो तो मुझसे,
दिल का हाल कहा करता है।

मेरे पीछे की खिडकी मे रहने वाला,
अम्बर का छोटा सा टुकडा,
मुझसे बात किया करता है ।

6 comments:

Enjoy Life!! said...

कभी जो धुन्धलाती शामों मे,
मन एकाकी सा हो जाता,
खोल पिटारे,ला कर तारे,
साथ मेरे खेला करता है।

-my fav part of your poem :)

btw....great poem and wonderful hindi

Veeresh_Milind276 said...

दूर देश मे बसा अभागा,
तुमको याद किया करता है।
पास नही तुम हो तो मुझसे,
दिल का हाल कहा करता है।

door desh me basa abhaga kisko yaad kiya karta hai?

Ankur said...

mazza aa gaya...waiting for more :)
Bahut acchi hai poem!

Braveheart said...

To be honest, I didn't like it. You've woven a much-too-longer thread than you can handle. My suggestion: make it shorter and force more control on your meter that goes haywire throughout the poem. The sound of the poem is like driving on a road full of potholes.

As for the thought, once the mood is set, you are actually not moving anywhere. Its repititiveness might even get on my nerves on second/third reading. So it should not be a bad idea to remove some fat off it.

-- Akshaya

abhaya said...

About the meter: I wanted to write a free verse poem and I ended up writing this one. I know that the verse is not the same through out but I cannot place where is meter going haywire. Can you point that out.

About the thought: I can try to explain but I will just say that after reading it 2-3 times, you may actually see what the initial paragraphs mean. I think I have said only what I wanted to say :)

madhurt said...

Kaafi pyari kalpna hai - soch raha tha kuch poetic sa comment maaroon lekin jo bhi sochta hoon aapki kavita padhke phir delete kar deta hoon!