Google Analytics

Monday, March 26

सागर किनारे

आज जाने क्यों बैठे बैठे मन मे पांडिचेरी का ख़्याल आ गया । लगभग २ साल हुए जब मैं पहली बार वहां गया था। बहुत सुना था उसके बारे मे पर पहली नज़र मे तो थोड़ी निराशा ही हुई थी। ग़लती शायद जगह की कम और साथ वालों की ज्यादा थी पर जब वापस लौटे तो उतनी ख़ुशी नही थी मन मे। कुछ ठगा सा महसूस कर रहा था, क्या मालूम था कि अपना थोडा सा मन वहीं छोड़ा आया था ।

उसके बाद से एक बार वहां जाना और हुआ पर मात्र एक दिन के लिए और आज अचानक यहाँ अमरीका मे बैठे बैठे मुझे याद आ भी रहा है तो पांडिचेरी ना कि दूसरे अनेक ऐसे स्थान जहाँ के यात्रा अनुभव कहीं अधिक स्मरणीय हैं । मुझे पता है कि कारण क्या है। मेरा मन पांडिचेरी की गलियों मे नही, उसके समुद्र के किनारे कहीं छूट गया है । असल मे पांडिचेरी ही एक मात्र ऐसी जगह है जहां मैं कुछ घंटों से ज्यादा, असल मे कुछ दिन तक समुद्र के पास रह सका हूँ । और गरजते समुद्र के सानिध्य मे कुछ पल बिताने जैसे अनुभव इस संसार मे कम ही हैं । आप अपने ह्रदय की कोई भी झंकार उन लहरों के गर्जन मे सुन सकते हैं और वो उमड़ती लहरें, एक मंझे हुए अभिनेता की भांति , एक धीर श्रोता से लेकर एक चुनौती देते प्रतिद्वंदी तक सभी पात्र सहजता से निभा लेती हैं । एक ऐसा साथी जिसके पास उतना ही समय है जितना आपके पास है, ना एक मिनट ज्यादा और ना एक मिनट कम ।

आज के जमाने मे ऐसे साथी कहॉ मिलते हैं और जब मिल जाते हैं तो छोडे कहां जाते हैं। देखिए ना, हज़ारों मील दूर भी पुकार साफ सुनाई देती है ।

Saturday, March 10

Speaking your heart out

As you get ready to walk up and take stage, your hands get moist, your feet give out that strange sensation of standing on top of a 100 story building, suddenly you need to go to loo, your throat is dry, your heart is going to stop. The place is not even well lighted but you feel all the spotlight on your face, as words come out you cannot even remember to breath and then you take one deep breath and ...

... you either loose it or you flow.

In my 14-15 odd years of public speaking, I have gone through this numerous times and I have been on both sides of the line. I have screwed it all up and I have taken the day. But what has not changed is the thrill, that rush of Adrenalin. Yes, like a drug addict, small doses don't satisfy the craving that much now and with the college life gone, even those small doses don't come my way any longer.

I realized this a few days ago that I have hardly stood up to speak in the last 2 and a half years since leaving college and that realization has reignited the craving. So much so that I am looking forward to my 2-3 class project presentations coming up later this semester. However, I am also a little skeptical. The audience I will have here would be so different from anything I have had before. Would I be able to connect to them? Would I be able to command all the nuances of English to bear upon my points as I used to in Hindi or let's say Hinglish? What about his tricky thing called sense of humor, do I even have one in context of Americans? And just how would I make up for all the cultural references which just became out of bounds?

Challenges are many. Perhaps this is the next stage of evolution for me as a speaker, moving from a frog in a small pond to the whole new world. Now I can choose to become a cautious, methodical and a won't-screw-up kind of speaker after whose talk people clap and mumble and forget. Or I can still try to go all out, speak from my heart and try to connect.

Of course I will screw up at times if I choose to be later but would that really matter? I am suddenly reminded of a very good example in this context. In 2005, Steve Jobs gave the commencement speech at Stanford. I received its text from some friend and was so delighted that I really wished if I could have been there to actually listen to it. Some months later, I discovered its video on youtube and after 2-3 minutes into it, I was so disgusted that I left it in between. Those powerful words that seemed so inspiring then actually look so hollow now that I can't even bring myself to read them again.

It is a speech that draws heavily from Steve's own life, beautifully joining the dots as he himself calls it. It is a speech that has to come directly from heart. And when you look at the video, you see a Steve Jobs standing there, reading it out from paper, not even looking up for half of the time and words which have so much emotions in them are just falling out like some dry stones. I was shocked but this was the first time I was listening to him so I gave him benefit of doubt. I decided to check out his keynotes in apple conferences to see if this is his normal talking style. But lo and behold ! there is the same Steve Jobs striding across the big stage, with a huge screen in the background, no paper in hand and you can see the passion, the enthusiasm now.

I don't know what to conclude about Jobs from this but what I know is that I never ever want to give a speech like that commencement speech to anyone. I think he ruined their day though somehow I saw all of them feeling very happy and cheering him. Perhaps he has too much money and is too successful for these things to matter or perhaps this is the cultural difference that I talked about earlier.

I just hope that honesty and passion would cut across these barriers.

Monday, March 5


दो दिन का तेरा मिलना जाने क्या क्या रंग दिखलायेगा,
मिलने की होगी खुशी या ग़म जाने का तेरे सतायेगा।

जो गले लगाऊंगा तो आंखें बोलेंगी दीदार करूं,
जो दूर हटा तो मन बांहों मे भरने को ललचायेगा।

यूं तो मुझको पर्याप्त नही जीवन भर भी तेरा मिलना,
और यूं दो पल का मिलना भी दिल गांठ बांध इतरायेगा।

बरसों फ़ैले बंजर मे ये दो कदमों का फ़िरदौस सनम,
आंखों मे भर दिल बंजारा, हंसकर आगे बड जायेगा।

हम साथ तेरे फ़िर से जो दिल की बंद पोटअलिया खोलेंगे,
कुछ लाद सकेंगे साथ और कुछ वहीं धरा रह जायेगा।

दिल का ना पूछो हाल, अभागा पगला है, दीवाना है,
दो दिन को धडकेगा फ़िर वापस ढर्रे पर आ जायेगा।

Thursday, March 1

गूगल समाचार अब हिन्दी मे !

तुलसी की लिखी हुई चौपाई याद आ गयी आज, "अति आनन्द उमगि अनुरागा..." जब गूगल के हिन्दी समाचार प्रष्ठ पर नज़र पडी तो। ना जाने कितनी बार google news India पर नीचे की सूची मे जा कर देखा था और सोचा था कि अगर यहां हिन्दी भी होती तो कितना अच्छा रहता। अब वह मनोकामना पूर्ण हो गयी है।

गूगल समाचार का आना सिर्फ़ एक भाषा प्रेमी का व्यर्थ का उत्साह नही है। इसके अनेक ऐसे फ़ायदे हैं जो कि शायद पहली नज़र ने दिखते नही हैं। अव्वल तो ये कि अब अलग अलग जाल प्रष्ठों को देख्ने के लिये अलग अलग फ़ोंट लगाते रहने की आवश्यक्ता नही है, जोकि हमारे आपके जैसे लोगों के लिये तो सिर्फ़ एक छोटी सी समस्या भर हो सकती है पर अनेकानेक लोगों के लिये बस वही अन्त हो जाता है। साथ ही साथ यूनीकोड मे होने से समाचारों को ढूंढना भी सरल हो जाता है।

पर इस सबसे बड कर बात है कि भाषा बदलने से समाचार पत्रों का पूर नज़रिया भी बदल जाता है। Google News India से अभी तक समाचारों की जो झलक मिलती थी वो अंगरेज़ी मीडिया के द्रष्टिकोण से दिखती थी, उन्हे क्या महत्वपूर्ण लगता है क्या नही वगैरह। हिन्दी समाचार पत्रों का द्रष्टिकोण इससे काफ़ी अलग हो सकता है। मेरे विचार से उस नज़रिये को भी पाठकों तक पहुचाना गूगल समाचार की सबसे बडी उपलब्धि है।

तो आप भी पडिये और आनन्द उठाइये।