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आजकल

जीभ पर कांटे उगे हैं, लेखनी मृतप्राय है, फिर भी संपादक महोदय की अभी एक राय है। अब है वो तैयार, दुनिया को बदल डालेगा वो, हाथ में अखबार, होठों पे सुलगती चाय है। ख़ौफ़ के सौदागरों की, धज अलग है आजकल, जेब में सिक्कों की खनखन, मुँह पे हाय हाय है। डालियों पे चंद ग़ुल, बेबाक हैं जलवाफरोश, कौन जाने मौसम-ए-गुल, आए है कि जाए है। अब कहां इंसानियत, जम्हूरियत, हक़, इंकलाब, अब अभागा दूध, मक्खन, घी कनस्तर, गाय है।

आज़ादी की क़ीमत

आज़ादी की क़ीमत ख़ून नहीं है। इतिहास के पन्ने मालिकों के नहीं, ग़ुलामों के ख़ून से लाल हैं। आज़ादी की क़ीमत है सर के पीछे उग आयीं दो और आँखें। हवाओं में बहेलिये की आसन्न आहट सुनते हुए कान। हड्डियों में समाती हुई बदनतोड़ अनवरत थकन।

अलविदा

मैं तैयार नहीं था अभी अलविदा के इतने खत लिखने के लिए। जानता था कि एक दिन हमें बिछड़ना है और उस रोज़ के लिए मुट्ठी भर दिन तुम्हारे नाम के मैंने रख छोड़े थे कि कुछ दिन फुर्सत से तुम्हे याद करूंगा। साथ गुज़ारे पलों को फिर से जियूँगा, हँसूँगा, रोऊंगा, मचल पर तुमसे वापस आने की ज़िद भी करूंगा, और फिर आहिस्ता से सब यादें सहेज पर रख दूंगा। पर यहाँ तुम गए हो और अगली आहट दरवाज़े पर है। जैसे जाने की होड़ लगी है! और मैं बदहवास सा इधर से उधर देख रहा हूँ, यहाँ से वहां दौड़ रहा हूँ , जैसे शादी की अगली सुबह के मेहमान विदा हो रहे हों और भाजी के डब्बे अभी तक बंधे न हों। ऐसा करो दोस्त, तुम भी आकर दिल में लगी मातमपुर्सी की कतार में लग जाओ, और रोज़ याद आकर देख लिया करो, कि तुम्हारे नाम के आंसू अभी मेरी आँखों में हैं या नहीं। मैं जानता नहीं कब, कितने हफ़्तों, महीनों या सालों में, पर ज़िन्दगी के गुज़रते पलों में कहीं किसी रोज़, दिल में उठ ता दर्द तुम्हारा होगा। लबों पर कांपती सदा तुम्हारे लिए होगी। और तब हमारी अलविदा मुकम्मल होगी। देखना, उसके पहले याद आना भूल मत जाना।

बिछड़ते दोस्तों के नाम

यादों की माला के मनके खोते जाएंगे, हम खुद से हर रोज़ बेगाने होते जाएंगे। मिलना जुलना, हंसना रोना, दुनिया भर के हिज्जे, रफ्ता रफ्ता सब अफ़साने होते जाएंगे। "आते हैं उस तरफ कभी तो तुमसे मिलते हैं", न मिलने के यूँही बहाने होते जाएंगे। इंक़लाब की बू है अब पुर-कैफ हवाओं में, बेवजह ही लोग दीवाने होते जाएंगे। भिंची मुट्ठियों, उठे कदम, लहराती बाहों से, बिछड़े साथी का हम साथ निभाते जाएंगे। गले नही  ल गते हैं, अब बस हाथ मिलाते हैं, यार अभागा सभी सयाने होते जाएंगे।

गणतंत्र

एक दिन गणतंत्र चला जाएगा  और रह जाएगा  सिर्फ झंडा। हम मगन रहेंगे झंडे के रंगों के मायने सुलझाने में और हमारे पैरों के नीचे पथरा जायेगी प्यासी जमीन। सिकुड़ते दिलों में जगह पड़ेगी कम तो एक एक कर के सब घुसपैठिये निकाल बाहर किये जाएंगे और देवताओं को रख दिया जायेगा उनके पत्थरों के घरों में। एक दिन प्रेम चला जायेगा और रह जाएगा सिर्फ देश।

क्या लिखूं?

छूटे कोई दीन दुखी ना, सबको करो शुमार लिखो, दबी हुई चीखों को बुन कर, कर्कश इक ललकार लिखो। धरम जो पूछे शरणागत का, जात जो पूछे साधो की, हिंदुस्तानी दिल ऐसा भी हुआ नहीं लाचार लिखो। लिखने दो उनको BSE, NSE और GDP, तुम आम आदमी की जेबों में बची चवन्नी चार लिखो। इस शोर शराबे में सहमा सा सच जो तुमको मिल जाए, एक बार लिखो, दस बार लिखो, तुम उसको बारम्बार लिखो। है वक़्त अभी कुछ कहने का, है वक़्त नहीं चुप रहने का, नफरत के तूफानों में घिरते, इंसानों को प्यार लिखो। सुनो अभागा बदल गए हैं यहाँ मायने शब्दों के, देशभक्त ऐसे हैं गर तो, खुद को तुम गद्दार लिखो।

काठ की हांडी

बचपन में पढ़ा था कि काठ की हांडी दोबारा नहीं चढ़ती और दूध का जला छाछ भी फूंक फूंक कर पीता है। लेकिन काठ मारे हुए समाज की हांडी को नफरत की कलई लगा कर भावनाओं की आंच पर बार बार चढ़ाया जा सकता है। बेकारी के दूध में धर्म की अफीम मिला कर कुंठित आशाओं के चावलों से उन्माद की जहरीली खीर बार बार बनायी जा सकती है। क्योंकि दूध का जला छाछ भी फूंक फूंक कर पीना जल्दी ही भूल जाता है।

मौसम

लम्बा शेर लिखोगे तो पछताओगे, सुनो 'अभागा' ट्वीट नहीं कर पाओगे। तेज़ हवा है, आग भड़कने वाली है, अंदर बाहर कहीं रहो जल जाओगे। पैने शब्दों की फसलों के मौसम में, हर ज़बान से लहू टपकता पाओगे। देशभक्ति के नए बने पैमाने पर, मुंह खोला तो तुम भी तौले जाओगे।

करवाचौथ

अंधश्रद्धा को बताया प्यार उसने, खेल जादू का दिखाया यार उसने। चाँद को देखा तभी एक कौर निगला, कर लिया यूँ उम्र का व्यापार उसने। साथ में भूखा रहा वो आदमी कल, नारी जाति का किया उद्धार उसने। वो बहू अच्छी रही होगी 'अभागा', सह लिया चुप रूढ़ियों का भार उसने।

एक नेता की व्यथा

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पोस्टर छपवाने पड़ते हैं, विज्ञापन देने होते हैं, रैलियां सैकड़ों लगती हैं, गठबंधन करने पड़ते हैं. जनतंत्र के सागर में मित्रों, कुछ लहरें सहसा उठती हैं, बाक़ी उठवानी पड़ती हैं. कुछ बात भूलनी पड़ती हैं, कुछ अजब करिश्मे होते हैं, अपराध मुक्त भारत के लिए, अपराधी चुनने पड़ते हैं. जनतंत्र के मेले में मित्रों, कुछ नाच नचाते बन्दर को, कुछ बन्दर-नाच नचाते हैं. कभी चाय बेचनी पड़ती है, इंटरव्यू देने पड़ते हैं, जब लोग कुर्सियां ना छोड़ें, तो धक्के देने पड़ते हैं. जनतंत्र की होली में मित्रों, कई रंग दिखाने पड़ते हैं, कई रंग बदलने पड़ते हैं.

शहर के फूल

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छोड़ कर शाख क्यों सड़कों पे चले आते हैं, फूल मासूम हैं, नाहक ही सज़ा पाते हैं। स्याह पड़ती हुई इस शहर की बेनूर शकल, रंग दो पल को झलकते हैं, गुज़र जाते हैं। भागते दौड़ते इस शहर के कुछ वाशिंदे, साल भर फरवरी की याद में बिताते हैं। फूल इंसान की उम्मीद के सितारे हैं, आँख उठती है दुआ में, तो नज़र आते हैं। शहर के फूल अभागा बड़ी किस्मत वाले, ठोकरों से नहीं, कारों से कुचले जाते हैं।

तो?

जब इस बार मिलें हम तुम, कुछ अलग सा मुझको पाओ तो, हाथ पकड़ लूं मैं बढ कर, तुम मुझसे शर्मा जाओ तो? नींद नही आये पर सपनो से बोझिल होकर पलकें, मुंद जाएँ और तुम काँधे पर सर रख कर सो जाओ तो? गर साथ हो बस दो पल का और फिर जीवन भर का इंतज़ार, दो पल न बीतें कभी, समय बस वहीं कहीं रुक जाए तो? जो कहना चाहें दोनो कुछ पर बात जुबां पर ना आये, और देख हमारी दुविधा चन्दा बादल में छुप जाए तो? कभी आँख तेरी गर भर आये और मेघदूत बन कर बादल, तेरी आँखों के मोती मेरे आँगन बिखरा जाए तो?

आर्तनाद

हार कर उठने की क्षमता अब नहीं मुझ में रही, वो ह्रदय की मधुर ममता अब नहीं मुझमे रही. अब तो मैं संसार के वारों से होकर छिन्न-भिन्न, बन गया हूँ रूद्र हिंसक आर्तनादी नरपशु. अब मेरी सब इन्द्रियां रक्षा में मेरी व्यस्त हैं. मधुर गुंजन मधुप का गांडीव की टंकार है दामिनी का दमकना अब युद्ध की ललकार है, दीख पड़ते हैं मुझे चहुँ ओर अपने शत्रु दल, सांस की आवाज़ मानो शून्य में चित्कार है. मान था अभिमन्यु सा, अब द्रोण सुत सी वेदना!

वादा

"तुम भी प्रियतम?" "अब छोड तुम्हे मुझको आगे जाना होगा, अब नयी मंजिलें रह रह पास बुलाती हैं। अब तुमसे जोडा नाता बंधन सा लगता, अब नयी सुबह कुछ नये क्षितिज दिखलाती है।" "अलविदा प्रिये!" ------------------------------------------------- "तज कर अतीत को और भविष्य पर दर्ष्टि जमा,  जीवन पथ पर आगे को मैं बढ आया हूं। हाथों के बंधन पैरों के कांटों बदले, टूटे वादों की किर्चें संग ले आया हूं। अब नये स्वप्न मानो आंखों मे चुभते हैं, अब नयी दिशा, अंजान डगर सहमाती हैं। अब द्रढ निश्चय से मेरा कोई साथ नही, ना नयी चुनौती अब उत्साह जगाती है। किस तरह से अब कोई नया नाता जोडूं? नाता फ़िर से एक दिन बंधन बन जायेगा। और तोड के बंधन फ़िर आगे जाना होगा, क्या यूंही अभागा ये जीवन कट जायेगा?"

दो अधूरी कवितायें

दो कवितायें। दोनो ही कुछ अधूरी सी पर जिन अहसासों से वो निकलीं थीं वो अब अपनी ताज़गी खो चुके हैं और इसलिये इनके पूरा हो पाने की ज्यादा उम्मीद शेष नही है। अतः जो कुछ भी है, हाज़िर है। १) पूरब रवि तत्पर आने को, पश्चिम मे विधु ढल जाने को, धूमिल पडते जाते तारे, जग से अंधियारा भाग रहा । कल रात नयन से निद्रा का एक पल को मिलना हुआ नही, पलकों मे बन्द रहीं आंखें, मन का दरवाज़ा खुला रहा। कोई बुला रहा ! २) हर एक दिल मे हमें दर्द बेहिसाब मिला , जब भी आंख खुली, चूर चूर ख्वाब मिला । सवाल जब भी उठे इश्क़ के, मोहब्बत के, हर इक निगाह से एक टका सा जवाब मिला । मिला इतना अभागा, भर गया दामन मेरा, गगन मिला, ज़मीं मिली, तुम्हारा साथ मिला ।

कूचा-ए-जाना

चलें कूचा-ए-जाना से, शहर को देख कर आयें, तबीयत भर गयी फ़ूलों से, कांटे देख कर आयें। नये मौसम मे सुनते हैं, नये अंदाज़ हैं उनके, बदल जायेगा दो दिन मे, नज़ारा देख कर आयें। जो आयें तेरी महफ़िल मे, ना जायें फ़िर कहीं उठ कर, कुछ आयें नये और कुछ सब ज़माना देख कर आयें। वो पिछले मोड पर जो राह छूटी हमसफ़र छूटा, कसक उठती है रह रह कर कि जायें देख कर आयें। हवा मे घुल रहा है दर्द, फ़िज़ां हो चली गमगीं, सुनाता है गज़ल फ़िर से अभागा, देख कर आयें।

मन

इस नयी ज़मीं पर मैने था जब धरा कदम, "मन लगता तो है?" पूछा जाता था हरदम। शुभचिंतक सब चिंता करते थे घड़ी घड़ी, यारों के मुंह से थी गुड लक की लगी झड़ी। अन्जान डोर एक थाम चल पड़े थे हम भी, मन मे थी थोड़ी खुशी और थोड़े गम भी। जिस ओर उठायी नज़र, मिला कुछ नया नया, उठ पायें कदम उससे पहले मन गया गया। नित नये नये आकर्षण मन को बहलाते, हम उत्साहित हो हो प्रियजन को बतलाते। उत्साह भरे स्वर ने उनको आभास दिया, हो गया अभागा वैल सैटल, अहसास दिया। तब से अब तक कुछ एक बरस है बीत चुका, और पात्र नयेपन की मदिरा का रीत चुका। अब मन यथार्थ की भूमि पर नंगे पांव, ढूंढा करता स्मृतियों की ठंडी छांव। जिन प्रश्नों पर हम गये बरस थे झल्लाते, अब उनके उत्तर ख़ुद को ही हैं दोहराते। "मन लगता तो है?" पूछा जाता था हरदम, मन लौट गया है देश, यहां तन्हा हैं हम।

मुलाकात

दो दिन का तेरा मिलना जाने क्या क्या रंग दिखलायेगा, मिलने की होगी खुशी या ग़म जाने का तेरे सतायेगा। जो गले लगाऊंगा तो आंखें बोलेंगी दीदार करूं, जो दूर हटा तो मन बांहों मे भरने को ललचायेगा। यूं तो मुझको पर्याप्त नही जीवन भर भी तेरा मिलना, और यूं दो पल का मिलना भी दिल गांठ बांध इतरायेगा। बरसों फ़ैले बंजर मे ये दो कदमों का फ़िरदौस सनम, आंखों मे भर दिल बंजारा, हंसकर आगे बड जायेगा। हम साथ तेरे फ़िर से जो दिल की बंद पोटअलिया खोलेंगे, कुछ लाद सकेंगे साथ और कुछ वहीं धरा रह जायेगा। दिल का ना पूछो हाल, अभागा पगला है, दीवाना है, दो दिन को धडकेगा फ़िर वापस ढर्रे पर आ जायेगा।

अदा

नये जौहरी नयी अदा वाले, तौल कर भाव बताने वाले। सब मिले हैं हमे ज़माने मे, यार अहसान जताने वाले। दिल खुदा का है यार का मेरे, और अंदाज़ ज़माने वाले। दिल की कालिख है आंख का काजल, वो हैं आंखों से पिलाने वाले। नाम कहने को है अभागा पर, हैं सब अंदाज़ दिवानों वाले।

डरते हैं

डरते हैं ना साकी को हम दिलदार बना लें, मय को ना ग़म-ए-दिल का चारागार बना लें। बस्ती से जो गुज़रा तो मुसाफ़िर ने की हसरत, हम भी ठहर के अपना एक घरबार बना लें। है चुक गया इंसान के दिल से खुदा का नूर, कहने को रहे बुत चलो दो चार बना ले । दे दो सभी के हाथों मे कलमें-ओ-किताबें, जुल्म-ओ-सितम से लडने का हथियार बना लें। ता उम्र बावफ़ा रहीं हैं हमसे अभागा, मायूसियों को ही न क्यों हम यार बना लें ।