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आजकल

जीभ पर कांटे उगे हैं, लेखनी मृतप्राय है, फिर भी संपादक महोदय की अभी एक राय है। अब है वो तैयार, दुनिया को बदल डालेगा वो, हाथ में अखबार, होठों पे सुलगती चाय है। ख़ौफ़ के सौदागरों की, धज अलग है आजकल, जेब में सिक्कों की खनखन, मुँह पे हाय हाय है। डालियों पे चंद ग़ुल, बेबाक हैं जलवाफरोश, कौन जाने मौसम-ए-गुल, आए है कि जाए है। अब कहां इंसानियत, जम्हूरियत, हक़, इंकलाब, अब अभागा दूध, मक्खन, घी कनस्तर, गाय है।

गणतंत्र

एक दिन गणतंत्र चला जाएगा  और रह जाएगा  सिर्फ झंडा। हम मगन रहेंगे झंडे के रंगों के मायने सुलझाने में और हमारे पैरों के नीचे पथरा जायेगी प्यासी जमीन। सिकुड़ते दिलों में जगह पड़ेगी कम तो एक एक कर के सब घुसपैठिये निकाल बाहर किये जाएंगे और देवताओं को रख दिया जायेगा उनके पत्थरों के घरों में। एक दिन प्रेम चला जायेगा और रह जाएगा सिर्फ देश।